प्रकाशित तिथि: 2026-09-07
अपडेट तिथि: 2026-09-07

बाजार संकट के दौरान अलग-अलग एसेट्स के बीच सहसंबंध अक्सर बढ़ जाता है, क्योंकि कीमतों को दिशा देने वाली ताकतें एक जैसी हो जाती हैं। सामान्य बाजार में इक्विटी, बॉन्ड, कमोडिटी और करेंसी अलग-अलग फंडामेंटल कारणों से प्रभावित होते हैं। लेकिन दबाव की स्थिति में साझा मैक्रोइकॉनॉमिक झटके, फंडिंग का दबाव, डीलिवरेजिंग और जोखिम लेने की इच्छा में बदलाव इन अलग-अलग कारणों पर हावी हो जाते हैं, जिससे विभिन्न एसेट क्लासों के बीच वास्तविक सहसंबंध बढ़ जाता है और डायवर्सिफिकेशन का फायदा कमजोर पड़ जाता है।
सहसंबंध यह मापता है कि दो एसेट्स के रिटर्न कितनी नजदीकी से एक साथ चलते हैं। +1 के करीब का आंकड़ा दर्शाता है कि दोनों एक ही दिशा में मजबूती से चलते हैं, 0 के करीब का आंकड़ा बताता है कि दोनों के बीच कोई खास सुसंगत रैखिक संबंध नहीं है, और -1 के करीब का आंकड़ा दिखाता है कि दोनों के रिटर्न आमतौर पर विपरीत दिशा में चलते हैं।
ये रिश्ते स्थायी नहीं, बल्कि हालात पर निर्भर होते हैं। सामान्य समय में किसी कंपनी का शेयर मुख्य रूप से उसकी कमाई पर, बॉन्ड ब्याज दरों और क्रेडिट क्वालिटी पर, कमोडिटी मांग और आपूर्ति पर, और करेंसी संबंधित देशों की मौद्रिक नीति के अंतर पर चलती है। लेकिन दबाव की स्थिति में कोई एक बड़ा मैक्रोइकॉनॉमिक, फंडिंग या जोखिम से जुड़ा कारक इन अलग-अलग वजहों पर हावी हो जाता है और कई बाजार एक ही जानकारी पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं।
इसीलिए वास्तविक सहसंबंध अचानक बढ़ सकता है, भले ही लंबी अवधि का औसत सहसंबंध मामूली ही क्यों न रहा हो। इक्विटी, हाई-यील्ड क्रेडिट (ज्यादा जोखिम वाले बॉन्ड), इमर्जिंग मार्केट एसेट्स और साइक्लिकल कमोडिटी इस असर के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं, क्योंकि ग्रोथ, वित्तीय हालात और जोखिम लेने की इच्छा में बदलाव का असर इन सभी पर एक जैसा पड़ता है। इस साझा झटके के फैलने का एक प्रमुख जरिया लिक्विडिटी यानी नकदी की स्थिति है।
बाजार में दबाव अक्सर नकदी की तत्काल जरूरत पैदा करता है। निवेशकों को रिडेम्पशन, मार्जिन कॉल, कोलैटरल की जरूरत या फंडिंग से जुड़ी ऐसी जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ सकता है जिनका उनके पास मौजूद एसेट्स की बुनियादी गुणवत्ता से कोई खास लेना-देना नहीं होता।
जब नकदी जुटाना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती है, तो अत्यधिक लिक्विड इक्विटी, सरकारी सिक्योरिटीज या दूसरी अच्छी क्वालिटी की होल्डिंग्स को सिर्फ इसलिए बेचा जा सकता है क्योंकि उन्हें नकदी में बदलना आसान होता है। ऐसे में जिन एसेट्स का आपस में सीधा आर्थिक संबंध नहीं होता, वे भी एक साथ गिर सकते हैं, क्योंकि उन्हें एक ही वजह, यानी लिक्विडिटी की जरूरत के चलते बेचा जा रहा होता है।
यह इस बात को भी समझा सकता है कि संकट की शुरुआत में डिफेंसिव एसेट्स भी कभी-कभी कमजोर क्यों पड़ जाते हैं। उनकी लंबी अवधि की खूबियां बरकरार रह सकती हैं, लेकिन नकदी की तात्कालिक जरूरत अल्पावधि में कीमतों पर हावी हो सकती है। इसलिए सहसंबंध में अचानक आई तेजी उतना ही फंडिंग के दबाव को दिखाती है, जितना बदलते फंडामेंटल को।
लिक्विडिटी का दबाव तब और ज्यादा असरदार हो जाता है जब लीवरेज, बिकवाली के फैसले को मजबूरी में की गई बिकवाली में बदल देता है।
जब कीमतें गिरती हैं और वोलैटिलिटी बढ़ती है, तो लीवरेज्ड पोर्टफोलियो को मार्जिन, फंडिंग या रिस्क लिमिट के दायरे में बने रहने के लिए अपनी पोजीशन घटानी पड़ सकती है।
यह प्रक्रिया खुद को और मजबूत कर सकती है। कीमतें घटने से पोर्टफोलियो का मापा गया जोखिम बढ़ जाता है, बढ़ा हुआ जोखिम पोजीशन घटाने पर मजबूर करता है, और यह कटौती और ज्यादा बिकवाली को जन्म देती है। वैल्यू-एट-रिस्क (VaR) सीमाएं, वोलैटिलिटी-टारगेटिंग स्ट्रैटेजी और मार्जिन की जरूरतें, ये सभी एक साथ एक्सपोजर घटाने की दिशा में काम कर सकती हैं।
अगर कई फंड एक ही वोलैटिलिटी के झटके पर प्रतिक्रिया देते हैं, तो बॉन्ड, इक्विटी पोजीशन और कमोडिटी एक्सपोजर, सभी एक साथ बेचे जा सकते हैं, भले ही इनके फंडामेंटल अलग-अलग हों। नतीजे में दिखने वाला सहसंबंध काफी हद तक यांत्रिक होता है, जो एसेट्स के बीच किसी नए आर्थिक जुड़ाव के बजाय पोर्टफोलियो से जुड़ी साझा सीमाओं से पैदा होता है।
यही वजह है कि संकट के दौरान बढ़े सहसंबंध को सिर्फ मैक्रोइकॉनॉमिक तर्कों से नहीं समझा जा सकता। फंडिंग का ढांचा और पोर्टफोलियो के नियम भी दबाव की स्थिति में वास्तविक सह-आवाजाही (को-मूवमेंट) को काफी हद तक बदल सकते हैं।
पूरी अवधि का सहसंबंध आंकड़ा उस रिश्ते को छिपा सकता है जो गंभीर गिरावट के दौरान सबसे ज्यादा मायने रखता है। दो एसेट्स के बीच बढ़त, गिरावट और सामान्य कारोबार को मिलाकर औसत सहसंबंध भले ही मामूली रहा हो, लेकिन जब बाजार तेजी से गिरता है, तो वे दोनों कहीं ज्यादा सकारात्मक रूप से जुड़ सकते हैं।
इस असमानता को अक्सर डाउनसाइड सहसंबंध कहा जाता है, और ज्यादा गंभीर मामलों में इसे टेल डिपेंडेंस कहते हैं। अंतरराष्ट्रीय इक्विटी बाजारों पर CFA इंस्टीट्यूट की रिसर्च ने बेयर मार्केट में काफी ज्यादा सहसंबंध दर्ज किया है और तर्क दिया है कि जोखिम के आकलन में सिर्फ औसत कोवेरियंस पर निर्भर रहने के बजाय टेल यानी सबसे बुरे हालात में सहसंबंध के व्यवहार को भी शामिल किया जाना चाहिए।
यही बात आगे की दिशा तय करने वाले बाजारों में भी दिखती है। ऑप्शन-इम्प्लाइड सहसंबंध पर S&P ग्लोबल की रिसर्च बताती है कि निचले स्ट्राइक लेवल पर इम्प्लाइड सहसंबंध ज्यादा होता है, यानी इक्विटी ऑप्शन बाजार ज्यादा प्रतिकूल हालात में एसेट्स के आपस में मजबूती से जुड़े होने की उम्मीद को कीमत में शामिल करते हैं। इसलिए एक अकेला औसत सहसंबंध आंकड़ा उस निर्भरता को कम करके आंक सकता है, जिसकी उम्मीद बाजार गिरावट की स्थिति में करते हैं।
यही वजह बताती है कि डायवर्सिफिकेशन लंबी अवधि के सैंपल में मजबूत क्यों दिखाई दे सकता है, जबकि सबसे बड़े नुकसान वाले मौकों पर यह उतनी सुरक्षा नहीं दे पाता।
""संकट में सहसंबंध एक हो जाता है"" वाली कहावत एक उपयोगी चेतावनी है, कोई तयशुदा नियम नहीं। दबाव के दौरान सहसंबंध तेजी से बढ़ सकता है, लेकिन इस बदलाव की दिशा और उसका आकार इस बात पर निर्भर करता है कि दबाव की वजह क्या है। CFA इंस्टीट्यूट की रिसर्च बेयर मार्केट में ज्यादा सहसंबंध की पुष्टि करती है, न कि इस दावे की कि हर एसेट जोड़ी यांत्रिक रूप से +1 पर पहुंच जाती है।
| बाजार दबाव का प्रकार | सहसंबंध पर आम असर |
|---|---|
| ग्रोथ या मंदी का झटका | इक्विटी, हाई-यील्ड क्रेडिट और साइक्लिकल एसेट्स आपस में ज्यादा नजदीकी से चल सकते हैं, जबकि उच्च गुणवत्ता वाले सरकारी बॉन्ड गिरावट को कुछ हद तक संतुलित कर सकते हैं |
| महंगाई का झटका | इक्विटी और लंबी अवधि के बॉन्ड एक साथ कमजोर पड़ सकते हैं, जिससे स्टॉक-बॉन्ड सहसंबंध ज्यादा सकारात्मक हो जाता है |
| लिक्विडिटी का झटका | जैसे-जैसे निवेशक नकदी जुटाते हैं, कई तरह के एसेट्स में सहसंबंध बढ़ सकता है |
| ब्याज दर का झटका | ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील इक्विटी और लंबी अवधि के बॉन्ड एक साथ गिर सकते हैं |
| क्रेडिट का झटका | इक्विटी, हाई-यील्ड बॉन्ड और वित्तीय एसेट्स आपस में ज्यादा मजबूती से जुड़ सकते हैं |
इसलिए सेफ हेवन का व्यवहार भी हालात पर निर्भर करता है। सरकारी बॉन्ड, ग्रोथ में कमजोरी की वजह से आई इक्विटी बिकवाली के दौरान तेजी दिखा सकते हैं, अगर उम्मीद हो कि सुस्त गतिविधि की वजह से ब्याज दरें घटेंगी। लेकिन अगर महंगाई या टर्म प्रीमियम को लेकर चिंताएं यील्ड को ऊपर धकेलती हैं, तो वही सरकारी बॉन्ड शेयरों के साथ गिर भी सकते हैं। सोना भी एक संकट में डिफेंसिव मांग से फायदा उठा सकता है, जबकि दूसरे संकट में, अगर नकदी की जरूरत या बढ़ती रियल यील्ड हावी हो जाए, तो कमजोर पड़ सकता है।
सबसे अहम सवाल यह है कि संकट के पीछे कौन-सा जोखिम कारक काम कर रहा है और कोई एसेट उसके प्रति सकारात्मक रूप से जुड़ा है या नकारात्मक रूप से।
स्टॉक-बॉन्ड का रिश्ता इस बात की साफ मिसाल है कि सहसंबंध मैक्रो रिजीम यानी व्यापक आर्थिक दौर के हिसाब से कैसे बदलता है। IMF की रिसर्च के मुताबिक, महामारी के दौर की महंगाई से पहले करीब दो दशकों तक बाजार में बढ़ती वोलैटिलिटी आमतौर पर शेयरों की गिरती कीमतों और बॉन्ड की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ चलती थी। इसके बाद के महंगाई वाले दौर में तेज दबाव के मौकों पर शेयर और बॉन्ड दोनों एक साथ गिरने लगे, जिससे यह पारंपरिक हेज कमजोर पड़ गया।
MSCI ने भी इसी रिजीम-निर्भरता को दर्ज किया है। एक तुलना में, इक्विटी में 34% की गिरावट के साथ बॉन्ड में 5% की बढ़त देखी गई, जिससे 60/40 का काल्पनिक पोर्टफोलियो 18% नीचे चला गया। वहीं ज्यादा महंगाई वाली बिकवाली के दौर में इक्विटी 26% और बॉन्ड 14% गिरे, जिससे वही मिश्रण 21% नीचे चला गया।
डायवर्सिफिकेशन स्थायी रूप से टूटा नहीं, बल्कि मैक्रो रिजीम बदल गया। जब घटती ग्रोथ और डिसइन्फ्लेशन (महंगाई में गिरावट) हावी होते हैं, तो बॉन्ड इक्विटी की कमजोरी की भरपाई कर सकते हैं। जब महंगाई और बढ़ती यील्ड ही दबाव की वजह हों, तो यही दोनों एसेट क्लास एक साथ सकारात्मक रूप से जुड़ सकते हैं।
बढ़ता सहसंबंध पोर्टफोलियो का जोखिम बढ़ा देता है, क्योंकि कोवेरियंस दो बातों पर निर्भर करता है, अलग-अलग एसेट की वोलैटिलिटी और वे आपस में कितनी नजदीकी से चलते हैं। अगर कई होल्डिंग्स आपस में ज्यादा सकारात्मक रूप से जुड़ जाएं, तो एक का नुकसान दूसरे से भरपाई होने की संभावना कम हो जाती है और पोर्टफोलियो की कुल वोलैटिलिटी बढ़ सकती है।
इससे डायवर्सिफिकेशन की एक व्यावहारिक कमजोरी सामने आती है। किसी पोर्टफोलियो में दर्जनों सिक्योरिटीज हो सकती हैं, फिर भी वह ग्रोथ, ब्याज दरों, क्रेडिट हालात या लिक्विडिटी जैसे एक जैसे अंतर्निहित एक्सपोजर पर ही केंद्रित हो सकता है। इसलिए होल्डिंग्स की संख्या असल में स्वतंत्र जोखिमों की संख्या से कहीं ज्यादा दिखा सकती है।
शांत दौर में तैयार किया गया सहसंबंध मैट्रिक्स इस समस्या को पहचानना और मुश्किल बना सकता है। ज्यादातर सामान्य हालात पर आधारित मॉडल यह अंदाजा कम करके लगा सकता है कि जब वोलैटिलिटी और सहसंबंध एक साथ बढ़ते हैं, तो नुकसान कितना हो सकता है। IMF ने खासतौर पर यह तर्क दिया है कि स्ट्रेस टेस्ट में सहसंबंध टूटने से जुड़े परिदृश्य भी शामिल किए जाने चाहिए, क्योंकि पारंपरिक हेज कमजोर पड़ने पर ऐतिहासिक रिश्ते जोखिम को कम करके दिखा सकते हैं।
इसलिए सिनेरियो टेस्टिंग में सिर्फ एसेट की कीमतों में आने वाले झटकों की ही नहीं, बल्कि एसेट्स के आपसी रिश्तों में आने वाले बदलावों की भी जांच होनी चाहिए। तनाव या डाउनसाइड की स्थिति में सहसंबंध यह दिखा सकता है कि जो पोजीशन सामान्य तौर पर एक-दूसरे को संतुलित करती हैं, वे कैसे एक ही कारक पर प्रतिक्रिया देने लगती हैं।
दबाव कम होते ही जरूरी नहीं कि बढ़ा हुआ सहसंबंध ऊंचा ही बना रहे। जैसे-जैसे लिक्विडिटी में सुधार होता है, मजबूरी में हो रही डीलिवरेजिंग की रफ्तार धीमी पड़ती है और अनिश्चितता घटती है, वैसे-वैसे अलग-अलग एसेट्स के अपने फंडामेंटल फिर से असर दिखाने लगते हैं। कंपनियां अपनी बैलेंस-शीट की मजबूती के आधार पर अलग-अलग प्रदर्शन करने लगती हैं, क्रेडिट बाजार अलग-अलग जारीकर्ताओं के बीच फर्क करने लगता है, और कमोडिटी फिर से अपनी मांग-आपूर्ति की वजहों पर लौट आती हैं।
यहां संरचनात्मक सहसंबंध और दबाव से पैदा सहसंबंध के बीच फर्क समझना जरूरी है। संरचनात्मक सहसंबंध टिकाऊ आर्थिक जुड़ाव को दिखाता है, जबकि दबाव से पैदा सहसंबंध अस्थायी हो सकता है और आर्थिक दौर पर निर्भर करता है। यही वजह है कि एक लंबी अवधि का औसत आंकड़ा न तो शांत बाजार को और न ही संकट के हालात को सही तरीके से बयां कर पाता है।
कई बाजार संकटों के दौरान सहसंबंध इसलिए बढ़ता है, क्योंकि कीमतें अलग-अलग एसेट के अपने-अपने फंडामेंटल के बजाय साझा मैक्रोइकॉनॉमिक, फंडिंग और जोखिम से जुड़े कारकों पर प्रतिक्रिया देने लगती हैं। लेकिन यह पैटर्न झटके की प्रकृति पर निर्भर करता है, मंदी, महंगाई और लिक्विडिटी से जुड़े संकट स्टॉक-बॉन्ड और सेफ हेवन के रिश्तों में बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर सकते हैं। इसलिए पोर्टफोलियो के डायवर्सिफिकेशन को केवल होल्डिंग्स की संख्या या लंबी अवधि के ऐतिहासिक औसत से नहीं, बल्कि अंतर्निहित जोखिम एक्सपोजर और तनाव या डाउनसाइड की स्थिति में सहसंबंध के आधार पर परखा जाना चाहिए।