प्रकाशित तिथि: 2026-08-13
मान लें कि आप सोमवार को EUR/USD खरीदते हैं और पोजीशन लगभग तुरंत आपकी स्क्रीन पर दिख जाती है। आपका प्रॉफिट और लॉस एक्सचेंज रेट के साथ बदलने लगता है, लेकिन अंडरलाइंग स्पॉट मार्केट में सामान्य तौर पर दोनों करेंसी का वास्तविक आदान-प्रदान बुधवार तक तय नहीं होता, बशर्ते बीच में कोई छुट्टी न हो।
फॉरेक्स में एग्जिक्यूशन (सौदा होना) और सेटलमेंट (भुगतान होना) अलग-अलग चरण हैं। ट्रेड डेट वह दिन है जब कीमत और रकम पर सहमति बनती है, जबकि वैल्यू डेट वह दिन है जब दोनों करेंसी का वास्तविक आदान-प्रदान होना तय होता है। कई प्रमुख स्पॉट करेंसी पेयर में यह अंतर दो कारोबारी दिनों का होता है, जिसे T+2 कहा जाता है।

यह मामूली-सा दिखने वाला अंतर उन कई प्रक्रियाओं के पीछे छिपा होता है, जो पोजीशन खुली रहने पर सामने आती हैं, जैसे रोलओवर चार्ज, ट्रिपल-स्वैप डे, हॉलिडे एडजस्टमेंट और स्पॉट व फॉरवर्ड प्राइसिंग के बीच का अंतर।
फॉरेक्स ट्रेड डेट वह दिन है जब सौदा तय होता है, जबकि वैल्यू डेट वह दिन है जब दोनों करेंसी का आदान-प्रदान होना तय होता है।
ज्यादातर प्रमुख स्पॉट FX ट्रांजैक्शन T+2 सेटलमेंट कन्वेंशन का पालन करते हैं, हालांकि कुछ करेंसी पेयर और ट्रांजैक्शन इससे पहले भी सेटल हो जाते हैं।
वीकेंड और छुट्टियां वैल्यू डेट को और आगे बढ़ा सकती हैं, क्योंकि दोनों करेंसी के लिए वैध सेटलमेंट दिन होना जरूरी है।
रिटेल फॉरेक्स पोजीशन को आमतौर पर फिजिकल सेटलमेंट के बजाय आगे रोल कर दिया जाता है, जिससे वैल्यू डेट का सीधा संबंध ओवरनाइट फाइनेंसिंग और स्वैप एडजस्टमेंट से बन जाता है।
सेटलमेंट कैलेंडर से यह भी समझा जा सकता है कि वीकेंड और छुट्टियों के आसपास रोलओवर चार्ज ज्यादा क्यों लगता है।
एक ही फॉरेक्स ट्रांजैक्शन के साथ तीन अलग-अलग तारीखें जुड़ी हो सकती हैं, और ये सौदे के अलग-अलग चरणों को दर्शाती हैं।
ट्रेड डेट वह दिन है जब सौदा एग्जीक्यूट होता है और उसकी शर्तों पर सहमति बनती है। अगर EUR/USD सोमवार को खरीदा जाता है, तो सोमवार ही ट्रेड डेट होगी।
स्पॉट डेट किसी स्पॉट FX ट्रांजैक्शन की स्टैंडर्ड सेटलमेंट डेट होती है। सामान्य T+2 कन्वेंशन का पालन करने वाले करेंसी पेयर में सोमवार को हुए सौदे की स्पॉट डेट आमतौर पर बुधवार होगी।
वैल्यू डेट वह तारीख है जिस दिन करेंसी की डिलीवरी होनी होती है। एक सामान्य स्पॉट FX ट्रांजैक्शन में स्पॉट डेट और वैल्यू डेट आमतौर पर एक ही सेटलमेंट दिन को दर्शाती हैं।
मान लें कि एक बैंक सोमवार को EUR/USD 1.1600 के भाव पर डॉलर के बदले 10 लाख यूरो खरीदता है। रेट और ट्रांजैक्शन साइज सोमवार को ही तय हो जाते हैं, लेकिन वास्तविक भुगतान की जिम्मेदारी बुधवार को आती है। एक पक्ष को 10 लाख यूरो देने होते हैं, तो दूसरे पक्ष को 11.6 लाख डॉलर। एक्सचेंज रेट पहले तय होता है, सेटलमेंट बाद में होता है।
फॉरेक्स की कीमतें मिलीसेकंड में बदल सकती हैं, लेकिन दो करेंसी के मालिकाना हक का आदान-प्रदान सिर्फ खरीदार और विक्रेता को मैच करने से कहीं ज्यादा जटिल प्रक्रिया है।
हर डिलिवरेबल फॉरेक्स ट्रांजैक्शन में भुगतान के दो पहलू होते हैं। डॉलर के बदले यूरो खरीदने वाले को यूरो मिलना है और डॉलर देना है, जबकि काउंटरपार्टी को इसके उलट करना होता है। ये भुगतान अलग-अलग बैंकों, पेमेंट सिस्टम, कानूनी क्षेत्राधिकार और टाइम जोन से गुजर सकते हैं।
पारंपरिक T+2 सेटलमेंट विंडो संस्थानों को ट्रांजैक्शन की पुष्टि करने और दोनों भुगतान की व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त समय देती थी। टेक्नोलॉजी ने इस प्रक्रिया को काफी तेज कर दिया है, फिर भी कई प्रमुख स्पॉट करेंसी पेयर के लिए T+2 ही स्टैंडर्ड कन्वेंशन बना हुआ है।
सेटलमेंट से एक खास तरह का जोखिम भी पैदा होता है। अगर कोई संस्थान अपनी बेची गई करेंसी की डिलीवरी, खरीदी गई करेंसी मिलने से पहले कर देता है, तो दूसरा पक्ष भुगतान न करे तो उसे पूरी रकम का नुकसान हो सकता है। आधुनिक पेमेंट-वर्सेज-पेमेंट सिस्टम ट्रांजैक्शन के दोनों पहलुओं को समन्वित करके इस जोखिम को कम करते हैं।
रिटेल प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग करने वाले ट्रेडर के लिए यह ज्यादातर इंफ्रास्ट्रक्चर नजर नहीं आता। लेकिन जैसे ही सेटलमेंट डेट का असर रोलओवर और फाइनेंसिंग पर दिखने लगता है, यह कहीं ज्यादा साफ नजर आने लगता है।
सबसे आम गलती T+2 को दो सामान्य कैलेंडर दिन मान लेना है। असल में इसका मतलब वैध सेटलमेंट दिनों से है।
सोमवार को हुए EUR/USD ट्रेड का सेटलमेंट आमतौर पर बुधवार को होता है, बशर्ते संबंधित करेंसी के लिए मंगलवार और बुधवार दोनों वैध कारोबारी दिन हों।
गुरुवार को हुए ट्रेड का कैलेंडर अलग होता है। शनिवार को आमतौर पर सेटलमेंट डे नहीं माना जाता, इसलिए वैल्यू डेट वीकेंड को पार करते हुए सोमवार तक खिसक जाती है।
सार्वजनिक छुट्टियां इसे फिर आगे खिसका सकती हैं। अगर बैंकिंग हॉलिडे किसी एक करेंसी को प्रभावित करता है, तो सेटलमेंट को तब तक रोकना पड़ सकता है जब तक ट्रांजैक्शन के दोनों पहलू पूरे न हो सकें।
इसका मतलब है कि वैल्यू डेट ट्रेड डेट में सिर्फ दो दिन जोड़ने से तय नहीं होती, बल्कि यह संबंधित करेंसी के सेटलमेंट कैलेंडर पर निर्भर करती है। यह कन्वेंशन सभी जगह एक जैसा भी नहीं है। करेंसी पेयर, इंस्ट्रूमेंट और मार्केट कन्वेंशन के आधार पर कुछ ट्रांजैक्शन T+1 पर या उसी दिन भी सेटल हो जाते हैं।
ज्यादातर रिटेल फॉरेक्स पोजीशन कभी इस स्थिति तक नहीं पहुंचतीं कि ट्रेडर को एक करेंसी मिले और दूसरी करेंसी की फिजिकल डिलीवरी करनी पड़े।
इसके बजाय, खुली रहने वाली पोजीशन को उसकी मौजूदा वैल्यू डेट आने से पहले ही आमतौर पर आगे रोल कर दिया जाता है। इससे सेटलमेंट की जिम्मेदारी किसी बाद के कारोबारी दिन पर खिसक जाती है, जिससे पोजीशन खुली रह पाती है।

यह प्रक्रिया सेटलमेंट डेट को सीधे ओवरनाइट इंटरेस्ट और रोलओवर से जोड़ती है। जब कोई पोजीशन ब्रोकर के रोलओवर टाइम के बाद भी खुली रहती है, तो करेंसी पेयर, ट्रेड की दिशा, मौजूदा फंडिंग रेट और ब्रोकर की प्राइसिंग के आधार पर फाइनेंसिंग एडजस्टमेंट क्रेडिट या डेबिट हो सकता है।
यहीं पर टॉम-नेक्स्ट (tom-next, यानी tomorrow-next) फॉरेक्स मार्केट की प्रक्रिया में शामिल होता है। मौजूदा स्पॉट ट्रांजैक्शन को सेटल होने देने के बजाय, पोजीशन को एक वैल्यू डेट से दूसरी वैल्यू डेट पर प्रभावी रूप से शिफ्ट कर दिया जाता है।
रिटेल पोजीशन में यह एडजस्टमेंट आमतौर पर फॉरेक्स स्वैप के जरिए दिखता है, जो पोजीशन को उसकी मौजूदा सेटलमेंट डेट से आगे ले जाने की लागत या फायदे को दर्शाता है। स्क्रीन पर एक्सचेंज रेट शायद मुश्किल से ही हिले, लेकिन पोजीशन से जुड़ी फाइनेंसिंग फिर भी बदल जाती है, क्योंकि सेटलमेंट पीरियड में एक और दिन जुड़ गया है।
सेटलमेंट कैलेंडर से यह भी समझा जा सकता है कि कई प्रमुख फॉरेक्स पेयर में जाना-पहचाना ट्रिपल रोलओवर क्यों लगता है। मानिए कोई पेयर स्टैंडर्ड T+2 कन्वेंशन का पालन करता है। पोजीशन को एक कारोबारी दिन से दूसरे दिन तक रोल करने पर आमतौर पर वैल्यू डेट एक सेटलमेंट दिन आगे बढ़ जाती है। मुश्किल तब आती है जब यह नई वैल्यू डेट वीकेंड को पार करती है।
कई प्रमुख करेंसी पेयर में बुधवार के रोलओवर के दौरान खुली रहने वाली पोजीशन की वैल्यू डेट शुक्रवार से सोमवार तक खिसक जाती है। इसलिए फाइनेंसिंग एडजस्टमेंट में शनिवार और रविवार के साथ-साथ एक अतिरिक्त कारोबारी दिन का भी हिसाब जोड़ना पड़ता है।
नतीजतन, एक साथ तीन दिन की ओवरनाइट फाइनेंसिंग चार्ज या क्रेडिट हो सकती है।
बुधवार को होने वाला बड़ा एडजस्टमेंट इसी सेटलमेंट कैलेंडर की वजह से बनता है। अलग-अलग इंस्ट्रूमेंट और छुट्टियां रोलओवर के सटीक शेड्यूल को बदल सकती हैं, इसलिए बुधवार को हर करेंसी पेयर के लिए एक सार्वभौमिक नियम नहीं माना जाना चाहिए।
सेटलमेंट डेट यह भी तय करती है कि भविष्य के एक्सचेंज रेट और फाइनेंसिंग एडजस्टमेंट की गणना कैसे होती है। मान लें कि दो करेंसी की शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट अलग-अलग हैं। सेटलमेंट को आगे बढ़ाने का मतलब है कि एक करेंसी को दूसरी करेंसी के मुकाबले लंबी अवधि के लिए प्रभावी रूप से फंड किया जा रहा है।
यह इंटरेस्ट रेट का अंतर स्वैप पॉइंट्स में शामिल होता है, जो बाद की तारीख में सेटलमेंट के लिए स्पॉट एक्सचेंज रेट को एडजस्ट करते हैं। इंटरेस्ट रेट के अंतर के आधार पर, इन पॉइंट्स को मौजूदा स्पॉट रेट में जोड़ा या घटाया जा सकता है। इन्हीं एडजस्टमेंट से फॉरवर्ड रेट बनता है, यानी वह एक्सचेंज रेट जो आज तय किया जाता है लेकिन भविष्य की एक तय तारीख पर सेटलमेंट के लिए होता है।
फॉरवर्ड रेट को यह मानकर नहीं देखना चाहिए कि भविष्य में स्पॉट रेट वहीं पहुंचेगा। इसकी प्राइसिंग मुख्य रूप से स्पॉट रेट, दोनों करेंसी की इंटरेस्ट रेट और सेटलमेंट तक बचे समय के बीच के रिश्ते को दर्शाती है।
यही प्रक्रिया छोटे स्तर पर तब भी दिखती है जब कोई ओवरनाइट पोजीशन रोल होती है। अगर वीकेंड या छुट्टी की वजह से अगली वैध वैल्यू डेट कई दिन आगे खिसक जाती है, तो फाइनेंसिंग एडजस्टमेंट में उन सभी दिनों का हिसाब जोड़ना पड़ सकता है।
इसलिए सेटलमेंट कैलेंडर में बदलाव से फॉरेक्स पोजीशन को होल्ड करने की लागत बदल सकती है, भले ही करेंसी पेयर खुद मुश्किल से हिला हो।
मान लें कि EUR/USD सोमवार को खरीदा जाता है और बीच में कोई छुट्टी नहीं है।
| दिन | क्या होता है |
|---|---|
| सोमवार | सौदा एग्जीक्यूट होता है। सोमवार ट्रेड डेट है, जब एक्सचेंज रेट और ट्रांजैक्शन साइज पर सहमति बनती है। |
| मंगलवार | ट्रेड खुला रहता है। सामान्य स्पॉट/वैल्यू डेट अब भी बुधवार ही है। |
| बुधवार | मूल T+2 वैल्यू डेट आ जाती है। किसी डिलिवरेबल इंस्टीट्यूशनल ट्रांजैक्शन में इस दिन यूरो और डॉलर का आदान-प्रदान होना तय होता है। |
खुली रहने वाली रिटेल पोजीशन को आमतौर पर अलग तरीके से हैंडल किया जाता है। फिजिकल सेटलमेंट होने देने के बजाय, पोजीशन को नई वैल्यू डेट पर रोल कर दिया जाता है और उस पर ओवरनाइट फाइनेंसिंग एडजस्टमेंट लागू हो सकता है।
अब इस उदाहरण में एक छुट्टी जोड़ते हैं। अगर किसी एक करेंसी के लिए अगला संभावित सेटलमेंट दिन उपलब्ध नहीं है, तो वैल्यू डेट को फिर आगे खिसकाना पड़ता है। यह अतिरिक्त समय सीधे रोलओवर की गणना में शामिल हो जाता है।
सौदा खुद मिलीसेकंड में एग्जीक्यूट हो सकता है, लेकिन उसका सेटलमेंट शेड्यूल कई दिनों तक फैल सकता है।
फॉरेक्स वैल्यू डेट तब तक सिर्फ बैक-ऑफिस की एक औपचारिकता जैसी लग सकती है, जब तक कोई पोजीशन ओवरनाइट होल्ड न की जाए।
इसके बाद यह उन कई बातों को समझाने लगती है, जिनका सामना ट्रेडर अक्सर करते हैं, जैसे खुले ट्रेड पर फाइनेंसिंग क्यों दिखती है, एक रोलओवर दूसरे से बड़ा क्यों होता है, छुट्टियां स्वैप शेड्यूल को क्यों बदलती हैं, और फॉरवर्ड एक्सचेंज रेट स्पॉट रेट से अलग क्यों होते हैं।
यह दो ऐसी प्रक्रियाओं को भी अलग करती है, जिन्हें आसानी से एक समझ लिया जाता है। एग्जिक्यूशन यह तय करता है कि सौदा कब तय होता है। सेटलमेंट यह तय करता है कि भुगतान की जिम्मेदारी कब आती है।
रिटेल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पहली प्रक्रिया को लगभग तुरंत कर देते हैं। दूसरी प्रक्रिया अब भी करेंसी मार्केट के पीछे मौजूद सेटलमेंट कैलेंडर के हिसाब से चलती है।
फॉरेक्स वैल्यू डेट वह कारोबारी दिन है, जिस दिन किसी FX ट्रांजैक्शन में शामिल दोनों करेंसी का आदान-प्रदान होना तय होता है।
कई प्रमुख स्पॉट ट्रांजैक्शन में यह तारीख एग्जिक्यूशन के दो कारोबारी दिन बाद आती है। वीकेंड, छुट्टियां और अलग-अलग मार्केट कन्वेंशन इसे आगे खिसका सकते हैं, जबकि खुली रहने वाली पोजीशन को आमतौर पर फिजिकल सेटलमेंट के बजाय आगे रोल कर दिया जाता है।
यही सेटलमेंट टाइमटेबल फॉरेक्स स्वैप, ओवरनाइट इंटरेस्ट और उन स्वैप पॉइंट्स के पीछे भी काम करता है, जिनकी मदद से एक्सचेंज रेट को एक वैल्यू डेट से दूसरी वैल्यू डेट तक ले जाया जाता है।